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पेप्टिक अल्सर और नोबेल पुरस्कार

विज्ञान, संघर्ष और सफलता की कहानी एक क्रांतिकारी खोज बैरी मार्शल और रॉबिन वॉरेन की कहानी


कभी समय था जब पेट की बीमारियों को जीवनशैली से जोड़कर देखा जाता था। पेट में जलन, दर्द और अल्सर —इन सबका कारण माना जाता था तनाव, मसालेदार खाना, और अनियमित जीवनशैली। लेकिन विज्ञान की दुनिया में एक खोज ने इस सोच को बदलकर रख दिया। यह एक कहानी है जिज्ञासा, संघर्ष और अंततः नोबेल पुरस्कार की।

पेप्टिक अल्सर क्या है?

पेप्टिक अल्सर पेट (stomach) या छोटी आंत (duodenum) की अंदरूनी परत पर होने वाले घाव होते हैं। ये अक्सर तेज जलन, पेट दर्द, मतली और भोजन के बाद दर्द का कारण बनते हैं। लंबे समय तक इलाज न होने पर ये घातक भी हो सकते हैं।

पुरानी मान्यताएँ और गलतफहमियाँ

20वीं सदी के मध्य तक, डॉक्टरों का मानना था कि पेप्टिक अल्सर का मुख्य कारण तनाव, ज्यादा एसिड बनना या जीवनशैली से जुड़ी आदतें हैं। मरीजों को दवाएं दी जाती थीं जो सिर्फ अस्थायी राहत देती थीं, लेकिन बीमारी का जड़ से इलाज नहीं होता था।
1980 के दशक की शुरुआत में,ऑस्ट्रेलिया के दो डॉक्टर — डॉ. बैरी मार्शल और डॉ. रॉबिन वॉरेन — ने एक अलग ही सिद्धांत प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि पेप्टिक अल्सर का असली कारण एक बैक्टीरिया है — Helicobacter pylori (H. pylori)। यह बैक्टीरिया पेट की परत को नुकसान पहुंचाकर अल्सर पैदा करता है।

साइंस के खिलाफ संघर्ष

उनकी बातों को शुरुआत में मेडिकल समुदाय ने सिरे से खारिज कर दिया। एक बैक्टीरिया कैसे पेट के अम्लीय वातावरण में जिंदा रह सकता है? यह तो असंभव लगता था। लेकिन डॉ. मार्शल ने पूरी दुनिया को चौंका दिया जब उन्होंने खुद H. pylori पीकर यह साबित किया कि इससे गैस्ट्राइटिस (पेट की सूजन) और अल्सर हो सकता है। उनका यह आत्म-प्रयोग मेडिकल इतिहास में साहस और समर्पण की मिसाल बन गया।

नया इलाज और क्रांति

इस खोज ने पेप्टिक अल्सर के इलाज में क्रांति ला दी। अब अल्सर का इलाज केवल एंटासिड या सर्जरी से नहीं, बल्कि एंटीबायोटिक दवाओं से संभव हो गया। इसने लाखों मरीजों को स्थायी राहत दी।

नोबेल पुरस्कार की प्राप्ति


2005 में, डॉ. बैरी मार्शल और डॉ. रॉबिन वॉरेन को नोबेल पुरस्कार (Nobel Prize in Physiology or Medicine) से सम्मानित किया गया। उनकी खोज ने न केवल चिकित्सा विज्ञान को बदल दिया, बल्कि यह भी सिखाया कि सवाल पूछना, परंपरा को चुनौती देना, और सत्य को खोजने का साहस ही असली विज्ञान है।
पेप्टिक अल्सर की कहानी सिर्फ एक बीमारी की नहीं है, यह उस जुनून और प्रतिबद्धता की गाथा है जो वैज्ञानिकों को सच्चाई तक ले जाती है। यह हमें सिखाती है कि जब तक कोई सवाल नहीं उठाता, तब तक सच्चाई नहीं बदलती।

आज हम जो इलाज की सुविधा पा रहे हैं, उसके पीछे कई वर्षों की मेहनत, संघर्ष और एक जुनूनी विश्वास है — कि सच्चाई को अंततः मान्यता मिलती है। 

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